पेड़ लगाने से ज्यादा क्यों जरूरी है पेड़ को बचाना?
5 जून को हम पर्यावरण दिवस मनाते हैं पौधे लगाते हैं और खुश हो कर के फोटो खिंचवाते और सोशल मीडिया पर सबको शुभकमनाएं भी भेजते हैं लेकिन ऐसे कितने लोग होंगे जो उस पौधे की रखवाली करेगा तब तक की वह पेड़ नहीं बन जाता सायद बहुत कम अब आप सोच रहे होंगे की अरे यह तो मेने भी किया ,पोधे भी लगाए पर अब तो पता नहीं । अगर बात करे के एक पोधे को पेड़ बनने में करीब 4से पांच वर्ष लग जाते हैं । लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है की हमारे आस पास जो बड़े बड़े पेड़ हैं उसे बचाने का हम कितना प्रयास कर रहे हैं शायद बिल्कुल भी नहीं , पर देखा जाए तो एक पेड़ लगाने से ज्यादा जरूरी है उसे बचाना क्योंकि पेड़ को बड़े होने टाइम लगता हैं लेकिन जो बड़ा पेड़ हैं वह हमारी कितनी जरूरतो को पूरा करता है । हम अपने जीवन में हमेशा यहीं सोचते हैं की जो तकलीफे हमने देखी वो हमारे बच्चे न देखे ,आने वाले पीढ़ियां न देखे तो फिर आपने कभी सोचा है की हम अपने सुखी जीवन के लिए इस पर्यावरण को न जानें कितना दुख पहुंचा रहे हैं जाने अनजाने में इस प्रकृति को कितना घात करते हैं उसी के परिणाम स्वरूप महामारी फैलना , अनेकों प्रकार से प्राकृतिक प्रकोप देखने को मिल रहे हैं और सोचो अगर आज ऐसी हालत हैं तो आने वाले समय में क्या स्थिति होंगी और हम क्या परोस रहे है अपने बच्चो को , और क्या देंगे अपनी आने वाली पीढ़ियों को ।

अगर बात करे बच्चो की जरूरतों की तो स्वास्थ्य, शिक्षा और आहार के साथ ही स्वच्छ पर्यावरण भी बच्चों का अधिकार है। लेकिन, इसके बाद भी हम अपनी आने वाली पीढ़ी को हर स्वास, पानी की हर घूंट और प्रत्येक निवाले के साथ गंभीर बीमारियों की तरफ धकेल रहे हैं। नदियों को गंदा करके और भूगर्भ जल को दूषित करके, पेड़ काटकर प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर पर्यावरण को बर्बाद करते जा रहे हैं। लेकिन यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि अपने बच्चों के लिए धरती को बचाएं अपनी अगली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण को बचाने के बारे में सोचे।
इसके लिए कुछ सुझाव जो सायद हमारी मदद कर सकते हैं
उच्च शिक्षा में शामिल हो पर्यावरण अध्ययन
इसके लिए सबसे पहला जरूरी काम हैं शिक्षा और शिक्षा में पर्यावरण को बचाने के लिए अगर बच्चो को जागरूक किया जाएगा तो निश्चित ही सुखद परिणाम मिलेंगे अभी सिर्फ 5वीं कक्षा तक ही इन्वाइरनमेंट स्टडीज विषय को पढ़ाया जाता है जहा तक जानकारी है।
तो हमें इन्वाइरनमेंट स्टडीज विषय को हायर स्टडीज में भी शामिल करना होगा। बच्चे अगर लगातार इसे पढ़ेंगे, तो उनका आकर्षण भी इस तरफ होगा। इसके लिए हमें स्कूल में कोशिश करनी चाहिए कि बच्चों को ज्यादा से ज्यादा अवेयर कर सकें।
इसके अलाव अगर देखे तो पॉलिथिन पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन हैं इसने जितना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया उतना सायद ही किसी और चीज ने तो इसके लिए हमे पॉलिथीन यूज न करने के लिए भी जागरूक करना होगा ।
और जागरुक करने का सबसे आसान तरीका स्कूल ही है क्युकी आपने अक्सर सुना होगा की जो हम देखते है वहीं सीखते हैं और जो सीखते हैं वही करते हैं
तो बच्चों का हर कार्य पर्यावरण से जुड़ा हो
स्कूल में बच्चे को जो सिखाया जाता है, उसका असर पूरे जीवन पर पड़ता है। स्कूलों में सप्ताह में एक बार कम से कम खेल, पेंटिंग आदि एक्टिविटीज हों, जो पर्यावरण से जुड़ी हों। बच्चे के पेड़-पौधों के बीच जाकर उनके प्रति जागरूक होंगे, साथ ही उनके नए दोस्त पेड़ों के रूप में बनेंगे।
स्कूल में ऐसी एक्टिविटीज होगी तो , वह स्कूल में जो सीखेंगे, उसका असर घर जाने के बाद भी दिखाई देगा।
बेवजह पेड़ काटना करें बंद करे।
एक समय था जब हमारे आसपास इतने पेड़ होते थे कि कई स्थानों पर हमेशा पेड़ों की छांव रहती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं दिखता। पेड़ों को बचाने के लिए हमें समझना होगा कि पेड़ भी हमारी तरह जीवित हैं और हमारे दोस्त हैं।
इसके अलावा हमे वरिष्ठ नागरिकों की संस्था भी बनानी चाहिए। उसके माध्यम से लोगों को और स्कूल के बच्चो को जागरूक करें, उनकी एक टीम बनाएं, जो पेड़ों की रक्षा का काम करे।
सरकारी कामों में अनिवार्य हो पेड़ लगाना
हम खराब हवा की चिंता तो करते हैं, लेकिन जब कुछ करने की बात आती है, तो हमेशा पीछे रह जाते हैं। लेकिन अगर प्रशासन बर्थ सर्टिफिकेट, पैन, आधार जैसे काम के लिए पेड़ लगाने अनिवार्य कर दे तो यह कितना बड़ा कदम हो सकता हैं पर्यावरण बचाने के लिए ।

पौधों के विज्ञान को समझाने की जरूरत
हम रोज अपने आस पास सुनते और देखते हैं कि 300 पौधे लगाए, 50 हजार पौधे लगाकर रिकॉर्ड बना दिया। लेकिन वह सिर्फ नाम के लिए पौधे लगा रहे हैं। वहीं अगर पौधो के पीछे की विज्ञान को देखे तो पीपल और नीम ऐसे पौधे हैं, जो हवा शुद्ध करते हैं। बेल पत्थर का पेड़ रेडिएशन को कम करता है। इसी प्रकार से हमें पौधों को सोच समझकर लगाना होगा जो हमारे काम आ सके और इसे बच्चों को भी समझाना होगा।
सबको पता हो की पेड़ काटे जा रहे हैं तो शिकायत कहां करनी है –
कहीं आग लगती है और पेड़ कटता है तो ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जो आवाज उठाना चाहते हैं। लेकिन, उन्हे यह पता ही नहीं होता है कि हम शिकायत कहां करें जिससे की उसको रोका जा सके । और इसके लिए प्रशासन को इस प्रकार के एक नंबर को सार्वजनिक कर देना चाहिए, जहा इस प्रकार की शिकायतें मिलती हैं तो हम उन नंबर पर बता सकें और करवाही कर सके।
हम सब को पर्यावरण बचाने के लिए आगे आना होगा
पर्यावरण एक ऐसा मुद्दा है, जिससे हर कोई प्रभावित हैं। और इसे बचाने के लिए सबको साथ आकर काम करना होगा। प्रशासन तक अपनी शिकायत पहुंचने पर कार्रवाई होती है लेकिन इसके अलावा हमारा अगर कुछ खर्चा होता है तो करें, क्योंकि बच्चों को ऐसे माहौल में लेकर नहीं जा सकते हैं।
पर्यावरण संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण
राजस्थान में पेड़ों को बचाने के लिए 363 लोगों अपना बलिदान दिया था, अब रेगिस्तान में नहीं काटी जाती है मारवाड़ के लोगों ने कई वर्षों पूर्व ही पर्यावरण का महत्व समझ लिया था। और इसका सबसे अच्छा उदाहरण है जोधपुर नजदीक खेजड़ली गांव। इस गांव के लोगों ने करीब 232 वर्ष पहले तत्कालीन महाराजा के कारिन्दों (कर्मचारी) जो हरे पेड़ों को काट रहे थे उनका विरोध किया था। और एक महिला अमृता देवी जिसके नेतृत्व में बारी-बारी से करीब 363 लोग पेड़ों को गले लगाकर कर खड़े हो गए लेकिन फिर भी महाराजा के कारिन्दों ने सभी को काट दिया।और इस तरह पेड़ों की रक्षा करते हुए 363 लोग वहीं शहीद हो गए। इस प्रकार पूरी दुनिया में पर्यावरण को बचाने के लिए एक साथ इतनी संख्या में अपनी जान कुर्बान करने की मिसाल और कहीं नहीं मिलती।
अमृता देवी बिश्नोई ने संभाली थी कमान
वर्ष 1787 में जोधपुर (मारवाड़) के महाराजा अभयसिंह ने मेहरानगढ़ में फूल महल का निर्माण शुरू करवाया था और इसके लिए लकड़ियों की आवश्यकता पड़ी तो महाराजा के कारिन्दों ने जोधपुर के पास में खेजड़ली गांव में एक साथ बड़ी संख्या में खेजड़ी के पेड़ देखे तो वहा काटने पहुंच गए। तब गांव की अमृता देवी विश्नोई ने इसका विरोध किया। लेकिन विरोध को अनसुना करने पर अमृता देवी पेड़ के चारों तरफ हाथों से घेरा बना कर और पेड़ को गले लगाकर खड़ी हो गई। लेकिन राजा के कारिन्दों ने तलवार से उसे मार दिया। इसके बाद बारी-बारी से उसकी तीन पुत्रियों ने पेड़ को बचाने के लिए पेड़ों को गले लगाया और अपना बलिदान दे दिया। पेड़ बचाने के लिए अमृता देवी के शहीद होने का समाचार आसपास के गांवों में फैला तो बड़ी संख्या में लोग वहा पहुंचने लगे और आसपास के 60 गांवों के 217 परिवारों से 294 पुरुष, 65 महिलाएं विरोध करने खेजड़ली गांव पहुंच गईं।
ये सभी लोग पेड़ों को पकड़ कर उन्हें गले लगाकर खड़े हो गए। लेकिन राजा के सैनिक नहीं रुके और कारिन्दों ने बारी-बारी से सभी को मौत के घाट उतार दिया। तभी एक साथ इतनी बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की जानकारी महाराजा अभयसिह तक पहुंची तो उन्होंने तुरंत सभी को वापस लौटने का आदेश दिया।
लेकिन अब खेजड़ी को नहीं काटा जा सकता
इसके बाद महाराजा अभयसिह ने लिखित में आदेश जारी किया कि मारवाड़ में आज के बाद कभी भी खेजड़ी के पेड़ को नहीं काटा जाएगा। और इस आदेश की आज तक पालना होती आई है। और इसी को लेकर भादवा सुदी दशम को बलिदान दिवस के रुप में जोधपुर के पास खेजड़ली गांव में प्रत्येक वर्ष मेला लगता है। और यहां इन शहीदों का एक स्मारक व वन क्षेत्र विकसित किया हुआ है। जहा इस मेले में हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं और बलिदानियों को नमन करते हैं।
क्या है खेजड़ी का महत्व
रेगिस्तान के कल्पवृक्ष खेजड़ी को शमी वृक्ष से भी जाना जाता है। यह मूलतः रेगिस्तानि भूमि में पाया जाने वाला वृक्ष है जो थार के मरुस्थल एवं अन्य आस पास के स्थानों पर भी पाया जाता है। अंग्रेजी में शमी वृक्ष को प्रोसोपिस सिनेरेरिया के नाम से भी जाना जाता है। रेगिस्तान में हरियाली बरकरार रखने में इस पेड़ ने अहम भूमिका निभाई है। इस पेड़ पर लगने वाले फल जिसे सांगरी कहते हैं इसका उपयोग सब्जी बनाने में होता है। इसकी पत्तियों से छोटे पशुओं को भोजन मिलता है। इस कारण ग्रामीण क्षेत्र में खेजड़ी आय का प्रमुख जरिया भी मानी जाती है।


पेड़ काटने वाले हों अरेस्ट
एक आरटीआई के जवाब में सामने आया है कि बीते 12 साल में किसी पेड़ काटने के मामले में या ऐसा करने वालों पर किसी पर भी कार्रवाई नहीं हुई है। सिर्फ कुछ जुर्माना कर उन्हें छोड़ दिया जाता है। लेकिन अगर पर्यावरण को बचाना है तो नियमों को सख्त करना होगा। और ऐसे लोगों को गिरफ्तार करना होगा। सिर्फ चिंता करने से कुछ नहीं होगा।
इस प्रकार से अगर हम प्रयास करते है तो पर्यावरण बचाने में बहुत बड़ा योगदान दे सकते हैं

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