राजस्थान में भाजपा का मुख्यमंत्री चेहरा कौन होगा? Rajasthan political viral news

राजस्थान विधनसभा चुनाव इसी साल को हैं और इसको लेकर भाजपा की रणनीतिक तैयारियां जोरो पर हैं। इस बीच वसुंधरा राजे हाल ही में बहुत सक्रिय नजर आ रही हैं । वैसे तो भाजपा में काफी सारे नेता मुख्यमंत्री पद के लिए मसक्क्त कर रहे हैं जिनमें राजेंद्र राठौड़, सतीश पूनिया,वही इस बार एक नाम और खूब चर्चा में है, वह हैं केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत।
राजस्थान में इस साल होने वाले चुनाव से पहले दिल्ली में पार्टी की महत्वपूर्ण बैठके चल रही हैं। भारतीय जनता पार्टी के आला नेता प्रदेश में भाजपा संगठन में फेरबदल , चुनावी रणनीति और अभियान समिति के चेहरे पर मंथन करने में जुटी है। इसी को देखते हुए राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भी दिल्ली बुलाया गया है और उनकी पार्टी के बड़े नेताओं के साथ चर्चा भी हुई है।
राजस्थान भाजपा में सबसे प्रभावी नेताओं में है वसुन्धरा
प्रदेष में यूं तो काफी भाजपा नेता एक्टिव हैं लेकिन, भाजपा पूर्व सीएम राजे की अहमियत को नकार नहीं सकती। बताया जा रहा हैं की वह राजस्थान चुनाव के सिलसिले में चर्चा के लिए बातचीत के लिए दिल्ली आई हैं, जहां उनकी मीटिंग पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ,केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, और पार्टी के महासचिव (संगठन) बीएल संतोष से होगी।
विधनसभा चुनाव के हार के बाद भी 2019 के लोकसभा चुनाव में बंपर जीत दर्ज की
2018 में भाजपा के हाथ से राजस्थान की सता चली गईं उस समय वसुंधरा राजे ही मुख्यमंत्री थीं। उसे समय एक नारा काफी चर्चा में रहा था वह था ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं।’ और लोगो ने जमकर बीजेपी के खिलाफ़ वोट किया जिससे चुनाव के बाद राजस्थान बीजेपी के हाथों से निकल गया। लेकिन, जब अगले ही साल 2019 में लोकसभा चुनाव हुए तो बीजेपी ने 25 में से 24 सीटें जीत लीं और एक पर उसकी सहयोगी को सफलता मिली।
कर्नाटक चुनाव में हार के बाद मोदी के आलावा क्षेत्रीय चहरे को भी देगी महत्व
कर्नाटक चुनाव के बाद बीजेपी में नेताओं का एक वर्ग है, जिसे लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ एक मजबूत क्षेत्रीय चेहरा का भी होना आवश्यक है और शायद राजे उसमें खुद को फिट देखती हैं। मिडिया रिपोर्ट्स की मानें तो वसुंधरा राजे की नजर इस वक्त चुनाव अभियान की प्रभारी के पद पर लगी हुई है। ऐसा माना जाता हैं की बीजेपी में यह जिम्मेदारी जिसे मिलती है,उसे ही चुनाव में पार्टी का प्रमुख चेहरा माना जाता है।
बीजेपी में चुनावों को देखते हुए हो सकते हैं बड़े ऐलान
राजस्थान में बीजेपी पहले से प्रदेष अध्यक्ष बदल चुकी हैं जिसमे सतीष पुनिया की जगह सीपी जोशी को अध्यक्ष बनाया था लेकिन अब विधनसभा चुनाव के हिसाब से पार्टी संगठन को पुनर्गठित करने की बाते भी सामने आ रही हैं ऐसा माना जा रहा हैं की बीजेपी राजस्थान में चुनाव अभियान के प्रभारी का ऐलान भी जल्द कर सकती है, ताकि कार्यकर्ता अभी से कमर कस ले।
वसुंधरा राजे की दावेदारी को क्यों दी जा सकती हैं तवज्जो!
राजस्थान में एक समय में गुलाब चंद कटारिया को वसुन्धरा के बाद भाजपा का सबसे कद्दावर चेहरा माना जाता था। लेकिन, बीजेपी ने इसका तोड़ निकालते हुए उन्हें पहले से ही असम का राजपाल बना दिया हैं और रेस से बहार कर दिया है। वही दुसरी तरफ वसुन्धरा राजे पिछले कुछ समय से राजस्थान के विभिन्न हिस्सों का दौरा भी कर रही हैं और प्रदेश भर में लोगो का मानना हैं वसुन्धरा को ही सीएम उम्मीदवार बनाना चाहिए ।
वसुंधरा राजे खुद ग्वालियर राज घराने के क्षत्रीय (राजपूत) परिवार से आती हैं और वह धौलपुर के जाट राज घराने की बहू भी हैं। और जब वह पिछले दिनों नागौर के खरनाल दौरे पर आई तो उन्होंने खुद को जाटों की बहू बताया और कहा की में आपकी ही बेटी ही उनका खुद का दावा रहा है कि राजस्थान के सभी 36 समुदायों में उनकी पैठ है।
वहीं गजेंद्र सिंह सेखावत क्यों है चर्चा में
लेकिन, इस बार भाजपा के अंदर केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से वसुन्धरा को काफी मुस्किलों का सामना करना पड़ सकता हैं पीएम मोदी ने अपनी कैबिनेट में गजेंद्र सिंह सेखावत को बड़ी जिम्मेदारी दे रखी है। और इस समय की सेंट्रल लीडरशिप से उनकी ट्यूनिंग राजे के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर बताई जाती है।
सीकर जिले में राजपूत परिवार में जन्मे शेखावत को इसलिए भी महत्व दिया जा रहा है क्युकी उन्होंने जोधपुर और पश्चिमी राजस्थान में सीएम अशोक गहलोत के दशकों के वर्चस्व को लोकसभा चुनावों में बहुत बुरी तरह ध्वस्त कर दिया। इस वजह से बीजेपी में उन्हें काफी अधिक महत्व दिया जा रहा है जबकि, राजे और गहलोत के बीच वैसा राजनातिक विरोध कम ही नजर आता है। कई तो यह भी आरोप लगाते हैं की राजे और गहलोत मिले हुए हैं
वैसे यह संभावना बहुत कम ही है कि राजस्थान में बीजेपी किसी नेता को औपचारिक तौर पर सीएम उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करेगी। भारतीय जनता पार्टी ने कर्नाटक में भी इस फैसले से परहेज किया था, हालांकि वहा उन्हें उसका उसे कोई फायदा नहीं मिला और काफी बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था। और यही वजह कि फिलहाल वसुंधरा अपना ज्यादा जोर चुनाव अभियान समिति का दायित्व संभालने पर ही लगा रही हैं।

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